Tuesday, March 9, 2021

जीवन

 हम जब छोटे थे तो एक खेल होता था, बिंदु मिलाओ और शेर बनाओ,  बड़े मजे से हम उसको खेलते थे, एक और खेल था अपने घर का रास्ता निकालने का, वो भी हम बड़ी जल्दी निकाल लेते थे, उस समय बड़ी खुशी मिलती थी ये सब खेल तुरंत समाप्त करने मैं, मुझे याद भी नहीं की शायद आज तक कोई ऐसा खेल मिला हो जिसने समाप्त होने मैं जरा सा भी समय लगाया हो, वैसे ऐसे भी खेल थे उस समय  जिनमे बहुत टाइम लगता था पर हम जैसे लोगो को वो कतई पसंद नहीं थे, शतरंज तब भी कठिन था और आज भी कठिन है, बस यहीं  गलती हुई जीवन को समझने मैं, हमने जीवन को उन्ही खेलो जैसा समझ लिया जिनको हम चुटकी बजाकर ख़तम कर लेते थे, हम समझ ही नहीं पाए की बास्तव मैं जीवन तो शतरंज की तरह ही है जहां हर वक़्त कोई न कोई चाल ही चल रहा  होता है और हमे फ़साने की कोशिश मैं लगा हुआ होता है, वास्तव मैं जो वो घर का रास्ता निकालने वाला खेल था वो उतना सरल था नहीं जितना हमें दिया गया, उसका हर एक मोड़  दिशा भ्रमित करने वाला ही निकला और कई बार तो हम यही भूल गए की हम वास्तव मैं कोन से रास्ते पर निकले थे और क्या हमारा वास्तविक उद्देश्य था, 

बहुत कठिन है जीवन को समझ पाना पर ये सरल हो सकता था अगर बचपन से ही शतरंज खेलने की कोशिश की होती और ये समझ लिया होता कि  जीवन की बहुत सी समस्याएं केवल समय देने भर से हल हो जाती हैं. आज समझ आ गया कि  साधारण से दिखने वाले वो बिंदु भी कठिन हो सकते हैं अगर आपको शेर का चित्र ही ना दिखाया गया हो. ... तो समय दीजिये जीवन की हर समस्यायों को , उनका हल अपने आप ही निकल आएगा.. 

Thursday, May 14, 2009

गजब कानून.... चश्मदीद लाओ......



ब्लॉग बनाते वक्त मैंने ऐसा नही सोचा था कि मैं इतने दिनों बाद लिखूगा, मैं सोचता था कि नियमित रूप से कुछ न कुछ लिखता रहूगा, पर पता नही ऐसा क्या हुआ कि लिखने से मन ही उठ गया, ऐसा लग रहा था कि न जाने कितने लोग ब्लोग्स में लिख रहे पर सुन कोई रहा है कि नही , आज अचानक शमा जी से बात हुई एक लंबे विराम के बाद , उन्होंने मुझे फिर से लिखने के लिए कहा और बहुत सी प्रेरणादायी बातें बताई ..........


ये जरुरी नही कि हम जो लिखे वो सराहा ही जाए, जरुरी ये है कि आप क्या लिख रहे हैं और उसका हमारे समाज पर क्या प्रभाव है .....आज मैं आप सबके सामने आतंकबाद से जुडा एक नया विषय प्रस्तुत कर रहा हूँ ...उम्मीद है कि आप जरुर लाभान्वित होगे ...........


लगभग १५० साल पुराना इंडियन एविडेंस एक्ट,(IEA) कलम २५ और २७ के तहेत बने कानून जिन्हें बदल ने की निहायत आवश्यकता है.... आप सब जानते हैं कि किसी भी अपराधी को सजा दिलाने के लिए एक अदद गवाह कि जरुरत होती है, अब प्रश्न ये उठता है कि क्या हर जगह गवाह मौजूद है ? आखिर कहा से पुलिस गवाह को लाये ? एक्ट में लिखा है कि जब भी कोई अपराधी जुर्म करता हुआ पकडा जाये तो अपराधी का वही पर पंचनामा करना परेगा वो भी २ गवाह कि मौजूदगी में ........................
अब मैं आपको बताता हूँ कि हमारे देश मैं फ़ैल रहे आतंकबाद में इसका क्या सहयोग है. हमारे देश के कुछ राज्य देश कि सीमाओं से सटे हुए हैं, देश में फ़ैल रहे आतंकबाद में प्रयोग हो रहे हथियार और बारूद शायद इन्ही सीमाओं से आता है, अब आप सोचेगे कि आखिर जब ये तस्करी होती है तब इनको पकडा क्यों नहीं जाता। मैं आपको बताना चाहूगा कि राजस्थान में सीमा से सटे हुए थानों में जो पुलिसवाले होते हैं उनकी जिम्मेदारी पूरी सीमा तक कि होती है, सीमा की दूरी थाने से २०-२५ किलोमीटर होती है, बीच में पूरा रेगिस्थान होता है, तब वो पुलिसवाला अकेला ऊट पर सवार होकर निकल परता है जुर्म की तलाश में ........... और हमेशा ऐसा होता है कि कोई न कोई तस्कर उसके हाथ में पर जाये, अब उसके सामने दिक्कत ये होती है कि आखिर इस रेगिस्थान में जहा २०-२५ किलोमीटर में कोई इंसान नज़र नहीं आता वहा वो गवाह कहा से लाये.... तब वो पुलिसवाला उस अपराधी को अपने साथ ही ऊट पर बिठाकर निकल परता है गवाह कि तलाश में............ मैं आपको बताता हूँ कि पंचनामा कैसे बनाता है वो ( मजबूरी में ) । वो जाता है पास के किसी गाव में और वहा के किन्ही २ लोगो को पूरी घटना बताकर पंचनामा में गवाह बना देता है और अपराधी को थाने में बंद कर देता है । अब शुरु होती है अपराधी पर केस की प्रक्रिया.... जब उस अपराधी पर केस चलता है तो कोर्ट में वो आसानी से गवाह के बयान पर ही छूट जाता है क्योकि गवाह तो मौका अ बारदात पर था नहीं। उसको तो वही पता है जो उसको बताया गया है, ऐसी परिस्थिति में गवाह वकील के प्रश्नों में फस जाता है और अपराधी बाइज्जत बरी हो जाता है... अब प्रश्न यह है की आखिर उस अपराधी को सजा कैसे मिले जिसको देखने को कोई गवाह नहीं है और उसको सजा कैसे मिले ?
में आप सबसे कहना चाहूगा की अगर हम अपने १५० साल पुराने इंडियन एविडेंस एक्ट में कुछ बदलाव कर दे तो हो सकता है कि आतंकबाद कि समस्या में कुछ अंकुश लग जाये....... अपील की है मैंने आपसबसे कि इस बात को आगे तक जरुर पहुचाये........... देश हित में .......आखिर चुप क्यों ?




Wednesday, November 5, 2008

बहुत दिनो से कुछ नया लिखने का मन हो रहा था पर परेशानी की बात ये है की किस विषय पर लिखा जाए ,
आज कल देश मैं इतना कुछ हो रहा है की आखिर किस बारे मैं लिखु सोचता रहता हू ,आज देश का कोई भाग
ऐसा नही है जहा सब कुछ शांतिमय चल रहा हो ,आज की परिस्थितियों को देखकर मुझे शमा जी की ये पंक्तियाँ
याद आती हैं , क्या मर गए सब इन्सान?
बच गए सिर्फ
हिंदू या मुसलमान?



Tuesday, October 21, 2008

आतंकवाद क्या ?


आज के समय में आतंकवाद एक ऐसा विषय है जिसके बारे मैं चर्चा आम हो गई है, आज इस देश में हर कोने पर इसका नाम है और हर कोई इसके बारे में बात करता है, हम चाहे किसी धर्म से हो, या किसी जाति विशेष से, प्रभावित हर कोई है, पर प्रश्न यह उठता है कि आख़िर आतंकवाद से मिलता क्या है ? या तो केवल कुछ लोग अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए इस तरह की गतिविधियों मैं लिप्त रहते हैं, या देश की शान्ति व्यवस्था को छिन्न भिन्न करने के उद्देश्य से ऐसे काम किए जाते हैं. जहाँ तक आतंकवाद का प्रश्न हैं इसको किसी संप्रदाय विशेष से जोड़ना ग़लत है क्योकि अगर ये किसी संप्रदाय के कारण होता तो जरुर इसका कोई न कोई समाधान होता, पर इस समस्या का आज तक कोई समाधान नही निकला, तब ये भी कहा जा सकता है कि ये स्वार्थ सिद्धि है जिसके कारण लोग इस तरह के काम करते हैं, मैं इस जगह आप सबका ध्यान महाराष्ट्र कि तरफ़ ले जाना चाहता हूँ, जहा तक मुझे लगता है कि महाराष्ट्र मैं जो कुछ हो रहा है वो भी तो एक प्रकार का आतंकवाद ही तो है, कुछ बड़े लोग, नाम न लेकर कहना चाहूगा कि केवल अपने स्वार्थ के लिए राजनीति कर रहे हैं और वो राजनीति किसी आतंकवाद से कम है क्या? आज हमारे देश मैं जहा सभी धर्मो को , जातियों को बराबर का हक मिला हुआ है, वहां किसी प्रदेश को इस देश से अलग समझना कहा कि राजनीति है? और सबसे बड़ी बात वहां रहने वाले लोगो को जिस तरह से प्रताडित किया जा रहा है वह आतंकवाद नही तो और क्या है? इसे कोई और नाम देना मुझे समझ नहीं आता, आज अगर पूरा देश आतंकवाद को हटाने के लिए सोच रहा है तो क्या हम महाराष्ट्र मैं हो रहे आतंकवाद को हटाने के लिए बात नही कर सकते जबकि इसका सीधा सम्बन्ध किसी संप्रदाय विशेष से नही है।
बस बात यही से शुरू होती है कि आख़िर हम चुप क्यो हैं? क्या हम मिलकर आवाज नही उठा सकते उन लोगो के खिलाफ जो हमारे देश को, प्रदेशो या बोली जाने वाली भाषा के आधार पर विभाजित करना चाहते हैं, जैसा कि मैंने पहले कहा कि आतंकवाद का एक अर्थ देश की शान्ति व्यवस्था को छिन्न भिन्न करना है तो क्या महाराष्ट्र मैं जो कुछ भी हो रहा है उससे देश की शान्ति व्यवस्था भंग नही होती क्या? तब तो हम इसको भी आतंकवाद के श्रेणी मैं रख सकते हैं, और अगर ये भी आतंकवाद है तो इसके खिलाफ वही ठोस कदम क्यो नही उठाये जा रहे जो आतंकवाद फैलाने वालो के खिलाफ उठाये जाते हैं, आज महाराष्ट्र मैं खुले आम उत्तर भारतियों को परेशान किया जा रहा है जो हमारे देश की अखंडता और प्रभुसत्ता के लिए खतरनाक है, आज मैं अपने देश के सम्मानीय नागरिकों से कहना चाहता हूँ की आप सब इस विषय पर जरुर समय दे ताकि ये बात आम जनता तक पहुच सके की आतंकवाद वो नही जो हमें बताया गया है बल्कि आतंकवाद वो है जो हमें परेशान करता है शान्ति से जीवन व्यतीत करने से ......................

आशा करता हूँ की जो भी मैंने लिखा है वो आप सबको सही लगेगा और आप सब मुझे सहयोग प्रदान करते रहेगे ।
धन्यवाद